Why to castrate goat?

As a student of Veterinary physiology I have never understand the reason behind castration. To run a successful goat farm you must have to sell your goats (males and females except replacement stock) by the time they prepare for castration. Anybody can understand the simple endocrinological principle of growth and weight gain.  Testis act as an endocrine gland which secretes steroid hormones called as androgens. Main androgen is testosterone. It starts secreted in the blood at the age of 3-4 months in male goats (for reference; http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/22444750). This is also considers as the best time to castrate the male goats.

Testosterone is an anabolic hormone which builds muscles in the body. It increases nitrogen retention and improves weight gain. In short, we can say testosterone helps in lean meat production with minimal fat content. It has been observed repeatedly at the farms that a non-castrated buck outweighs the castrated bucks by 15 to 25%.

Function of testosterone in male goats;

  1.              It produces thick hair coat with erect craig;
  2.         Testosterone increases 50% muscle mass as compare to female
  3.         Testosterone increases bone matrix and causes calcium retention
  4.         It increases rate of bone growth – height of the animal increases more than female of same age.
  5.         It increases total basal metabolic rate by 15% – which means it helps in utilizing nutrients more efficiently than castrated goat of same age.
  6.         It increases total red blood cells in the blood which carries large amount of oxygen to the growing tissues.
  7.         It helps in retaining water in the body and contributes 10% more water in non castrated bucks than castrated.

However, basic reason behind castration was to check indiscriminate breeding in the flock and to keep animal calm if you have to keep them in a flock after puberty. But question is that why to keep animal after puberty if you don’t want to keep them for breeding. Farmers must know the fact that after puberty (6-8month of age) body weight gain and growth start decreasing and FCR (feed conversion ration decreases. In this condition you feed more and gain less.

So you should sold out your kids at early age of 6 to 8 month (before breeding stage) and keep yourself away from this brutal technique which is not so worthy as it seems.

Advantage of non castrated males

 

  1.     Higher weight gain than castrated male
  2.         More lean meat (less fatty which is desirable for market) than castrated
  3.         Zero chances of infection because you prevent castration injuries
  4.         Overall cost of production decreases
  5.         No need to take any training for castration
  6.     Make your farming ethical

Common Goat Diseases in India and their Signs and Symptoms

Disease Signs and Symptoms First Aid
खुर पका मुह पका मुह में, जीभ पर, थनो पर और पैरो पर छाले पाये जाते हैं.
बकरियाँ लंगड़ा कर चलती हैं, नये पैदा हुए बच्चे अक्सर मर जाते हैं. इसलिए तीन महीने की ग्याभन  बकरियो को FMD की Vaccine लगानी चाहिए.
मुह अथवा पैरो के छालो को फिटकरी या पिंकी के पानी से धोए और 2% lizol से फार्म में सुबह शाम  छिड़काव करें. यदि बुखार ज़्यादा हो 1ml melonex हरएक 15kg वज़न के हिसाब से इंजेक्षन लगाए.
चेचक मुह और शरीर पर लाल रंग के चक्कदे देखने को मिलते हैं इस बीमारी का कोई इलाज नही है. इसलिए इसमे समय से वॅक्सीन लगवाते रहें.
PPR या महामारी यह बीमारी काफ़ी जानलेवा होती है. इसमे बकरियों में पहले 3 – 7 दिनो तक तेज़ बुखार रहता है. उसके बाद बकरियो में दस्त शुरू हो जाते हैं. साथ ही निमोनिया भी हो जाता है और नाक बंद हो जाती है जिससे बकरियाँ सांस नही ले पाती और मर भी जाती हैं इस बीमारी में कोई दवाई काम नही करती परंतु बुखार को रोकने के लिए 1ml Melonex 15 किलो वज़न के हिसाब से दे 2ml OTC – LA भी साथ मे दे
कन्टेजियस एकथाईमा इसमें भेड़-बकरी के मुंह, नाक व होठों के बाहरी तरफ फोड़े हो जाते है काफी बढ़ जाते है जिससे मुंह फूल जाता है तथा घास खाने में तकलीफ होने के साथ-साथ बीमार भेड़-बकरी को हल्का बुखार भी रहता है| उपचार हेतू फोडों को लाल दवाई के घोल से धोकर उन पर एन्टीसेप्टिक मलहम लगाना चाहिए, ज्यादा बीमार भेड़-बकरी को कहर-पांच दिन एन्टीवायोटिक 2ml OTC – LA इन्जेक्शन लगाना चाहिए|
ब्रूसीलोसिस इस बीमारी में गाभीन बकरियों में चार या साढ़ेचार महीने के दौरान गर्भपात हो जाता है, बीमार बकरी की बच्चेदानी भी पक जाती है| गर्भपात होने वाली बकरियों की जेर अटक जाती/समयानुसार नहीं गिरती, इस बीमारी से मेंढों व बकरों के अण्डकोश पक जाता है तथा घुटनों में भी सूजन आ जाती है, जिससे इनकी प्रजनन क्षमता कम हो जाती है| कई बार बकरी पालक गर्भपात हुए मृत मेमने को उसके बकरी की जेर खुले में फेंक देते है जिससे की इस बीमारी के कीटाणु अन्य झुंड में भी फैल जाते है| अत: बकरी पालकों को चाहिए कि वह ऐसे मृत मेमने व जेर को गहरा गढ्ढा कर उसमें दबा देना चाहिए| यह रोग भेड़-बकरियों से मनुष्य में भी आ जाता है| जिससे मनुष्य में हल्का बुखार, बदन व सर दर्द अधिक पसीना आना|
गलघोंटू यह बीमारी बकरियों में जीवाणुओं द्वारा फैलती है तथा मुख्यता जब  बकरी पालक अपने झुंड को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है उस समय इस रोग के अधिक फैलने की संम्भावना होती है| इस बीमारी से बकरियों के गले में सूजन हो जाती है जिससे उसे सांस लेने में कठिनाई होती है तथा इस बीमारी में बकरी को तेज़ बुखार, नाक से लार निकना तथा निमोनिया हो जाता है| इस बीमारी में जल्दी से जल्दी 1gm Dycristicin नामक injection लगाए और साथ ही 2ml Melonex तथा 1ml cadistin लगाए.
एन्टीरोटोक्सीमियां  यह भेड़ का असंक्रामक रोग है, यह मुख्यता जीवाणुओं द्वारा फईलता है, यह जीवाणु प्राय: बकरियों के पेट के अन्दर होता है, इस बीमारी में बकरियों में तेज़ पेट दर्द होता है, और अधिकतर छोटे बच्चों में यह रोग ज्यादा होता है तथा जानवर धीरे-धीरे कमज़ोर हो जाता है कई बार उसे चक्कर आते हैं, मुंह से झाग निकलता है, औए दस्त के साथ खून भी आता है| प्राथमिक उपचार हेतू नमक व चीनी का घोल पिलाना चाहिए, क्योंकि यह दस्त के कारण जानवर के शरीर में हुई पानी की कमी को पूरा करता है इसके साथ-साथ पेट के कीड़ों की दवाई अपने झुंड को पिलानी चाहिए. इस बीमारी के दिखाई देने पर 1gm tetracycline नामक पाउडर खिलाना चाहिए . बचाव हेतू बकरी पालक को वर्ष में एक बार टीकाकरण करवाना चाहिए|
गोल कीड़े इस प्रकार के कीड़े मुख्यता बकरियों की आंतों में पहले धागे की तरह लम्बे व सफेद रंग के होते हैं जोकि बकरियों की आंतों से खून चूसते हैं, कई बार बकरियों में इन कीड़ों के कारण दस्त लगते हैं, जिससे जानवर कमज़ोर हो जाता है, तथा ऊन उत्पादन में भी कमी आ जाती है| हर तीसरे महीने Fentas (1gm) की एक गोली अवश्या दें. तथा पैदा होने के 8 दिन बाद बच्चो को 15ml albomar नामक दवाई पिलाए
फेफड़ों व श्वास नली के गोल कृमि/कीड़े; लंग वर्म यह बकरियों के फेंफडों व श्वास नली में होते हैं तथा इसके कारण बकरियों में वरमिनस न्यूमोनिया हो जाता है, बीमार बकरियों में खांसी हो जाती है तथा उनके नाक से गाढ़ा पानी निकलता है ऐसी भेड़-बकरियों को सांस लेने में तकलीफ होती है तथा फेफड़े खराब हो जाने से जानवर मर जाते हैं| बकरियों के मेगनियों की जांच करवानी चाहिए तथा मृत बकरियों का शव परीक्षण करवाने से इस रोग का पता चलता है| हर तीसरे महीने Fentas (1gm) की एक गोली अवश्या दें. तथा पैदा होने के 8 दिन बाद बच्चो को 15ml albomar नामक दवाई पिलाए.
बकरियों में चर्म रोग अन्य पशुओं की भांति बकरियों में भी जूएं, पिस्सु, चिच्द इत्यादि परजीवी होते हैं, यह बकरियों की चमड़ी में अनेक प्रकार के रोग पैदा करते हैं जिससे जानवर के शरीर में खुजली/चरड हो जाती है तथा जानवर अपने शरीर को बार-बार दूसरे जानवरों के शरीर व पत्थर या पेड़ से खुजलाता है जिससे किउस जगह पर जख्म हो जाता है उस जगह की चमड़ी सख्त हो जाती है, व बाल झड़ जाते है और धीरे धीरे यहबकरियों के पूरे शरीर में फील जाती है तथा एक बीमार जानवर से पूरे झुंड/घण में फैल जाती है| बकरियों को बीमारी वाले जानवरों से अलग रखें, और बीमारी वाले जानवरों को अधिक नमी वाली जगह पर ण रखें, जख्मों को लाल दवाई से धोऐं व हिमैक्स मलहम जख्मों पर लगाएं, पशु चिकित्सक की सलाह अनुसार इन्जेक्शन ivermectin चमड़ी में लगवाएं| इस रोग के बचाव हेतू वर्ष में भेड़-बकरियों को कम से कम दो बार कीटनाशक स्नान/डिपिंग अवश्य करवाएं|